विश्लेषक एवं संपादक :- आदर्श चंद्राकर
भारतीय स्वतंत्रता का कड़वा सत्य
भारत वर्ष की स्वतंत्रता दिवस पर्व की पूर्व संध्या पर मेरे मानसपटल में कुछ सवाल आ रहा है। क्या हम इस देश मे सचमुच में आजाद हैं? ऐसी कौन सी व्यवस्था है जिसमे आजादी के उपरांत अंतर आया है?
क्या मात्र सरकार चुनने की आजादी या फिर चुनाव में वोट देने की आजादी मात्र को स्वतंत्रता कहा जा सकता है? भारतीय संविधान हमें अभिव्यक्ति की आजादी भी देता है पर विगत कुछ वर्षों से देश या प्रदेश की सरकारों के गलत कार्यों की खिलाफत या विरोध जताना भी अपराध की श्रेणी में गिना जाने लगा है। स्वतंत्र भारत के नागरिकों को अपने द्वारा चुनी गई सरकार के द्वारा गलत कानून या नियम बनाने का विरोध जताने का अधिकार जनता को क्यों नही होना चाहिए? उसे किसी भी व्यक्ति को देशद्रोही कहने का अधिकार कहाँ से मिल जाता है। भारत का नागरिक अपनी सरकारों से उनके कार्य संबंधित प्रश्न क्यों नही कर सकता? अगर जनता को लगता है कि उन्होंने गलत व्यक्ति या गलत लोगों के हाथ मे सत्ता दे दी है तो उन्हें अपना फैसला बदलने का अधिकार क्यों नही है? क्या सही मायने में आम जनता के लिए प्रसाशन, कानून और न्याय व्यवस्था कार्य करते हैं जो सर से पांव तक भ्रस्टाचार में धंसा हुआ है।
क्या आम जनता का देश की प्राकृतिक संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं? इस देश का नाम भारत वर्ष इसलिए पड़ा क्योंकि यह धरती सबकी भौतिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक जरूरतों की पूर्ति करने में सक्षम थी। इस भूखंड में प्रचूर मात्रा में प्रकृति ने सबकी निम्न जरूरतों की पूर्ति के साधन बनाये थे। पर जैसे जैसे मानव सभ्यता आधुनिक युग मे आती गई मानव इतिहास में अमूल चूल परिवर्तन होने लगे। आधुनिकता में किसी भी व्यवस्था को बनाने के लिए अत्यधिक धन का इस्तेमाल होने लगा। कुछ लोगों ने चालाकी, छल और भ्रष्ट प्रसाशन के सहारे जरूरत से ज्यादा संपत्ति संग्रहित करना शुरू कर दिया। पूर्व के समाज मे वर्ण व्यवस्था थी उसमें हर समाज मे कार्यों को बाँट दिया गया था और लोग उन कार्यों में दक्ष होकर एक दूसरे का सहयोग कर अपनी आजीविका अर्जन कर लेते थे और अपने परिवारों का भरण पोषण कर लेते थे। बाद में बड़े बड़े शासक होने लगे तो उन्होंने अपने राज्य में व्यवस्था बनाने के लिए अमीरों से कर वसूलना शुरू किया बाद में कुछ शासकों का लालच बढ़ा तो वह आमजन से भी कर वसूलना शुरू कर दिए जो मुश्किल से अपने परिवार का भरण पोषण कर पाते थे। उसके बाद गुलामी का काल आ गया जिसमें विदेशी शासकों के हाथ मे शासन आ गया। मुगलों ने तो यहाँ रहकर यहाँ राज किया और यहाँ की संपत्ति से अपने राजमहल का भंडार भरा और कुछ प्रगति के भी कार्य किये। उसके बाद अंग्रेजों का शासन आया तो उन्होंने तो भारत वर्ष की संपत्ति की लूट ही मचा दी और साथ ही साथ जनता पर अत्यधिक ज्यादतियाँ कर उनसे लगभग हर प्रकार की आजादी छीन ली। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के बहुत संघर्ष एवं आमजन के सहयोग के उपरांत भारत वर्ष को अंग्रेजी राज से आजादी मिली। यह वह समय था जब हर भारतीयों के दिलों में खुशी की लहर दौड़ गई पर जाते जाते भी अंग्रेजों ने भारतीयों में मजहबी एवं जाति पाति का जहर बो दिया और भारत वर्ष के मजहब के आधार पर दो टुकड़े कर दिए। सम्पूर्ण भारत वर्ष आजादी के तुरंत बाद एक दूसरे के खुन का प्यासा हो गया। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का दिल छलनी छलनी हो गया। किसी तरह उस समय शांति का माहौल पैदा किया गया पर पुनः आजाद भारत मे चंद स्वार्थी भारतीयों को जो व्यापार में दक्ष थे के मन मे देश की संपत्ति लूटकर संग्रहित करने का सपना तैरने लगा। भारत वर्ष को राजनीतिक आजादी तो मिली पर सत्ताधारी राजनेताओं का ईमान डोलने लगा। सत्ता में रहते हुवे उन्हें भी राजसी जिंदगी जीने के सपने ने घेर लिया। स्वार्थी पूंजीपतियों ने जो व्यापार करना जानते थे और आधुनिक युग मे आद्योगिक सामर्थ्य भी सीखने लगे थे ने यह मौका हाथ से न जाने दिया। पहले उन्होंने राजनेताओं को राजसी जीवन के लालच के पाश में बांधकर उन्हें अत्यंत भ्रष्ट बनाया। राजनेताओं के भ्रष्ट होने से प्रसाशन में कार्य करने वाले सरकारी नौकरीपेशा लोगों के मन मे भी लालच पैदा होने लगा और सभी मिलकर देश की प्राकृतिक संपत्ति एवं जनता से कर द्वारा जमा किये गए धन को लूटने में कोई कसर नही छोड़ा। वर्तमान में यह स्थिति हो चुकी है देश की जनता को लगभग हर कार्य के लिए देश के सत्ता में बैठे लोगों और प्रशासनिक कर्मियों को चढ़ावा चढ़ाना पड़ता है। देश की संपत्ति पर आमजन का कोई अधिकार नही बल्कि पूंजीपति लोगों को ही लूटने का अधिकार है। राजनेता देश की जनता की निम्न सुविधा की व्यवस्था बनाने की अपनी नाकामयाबी के लिए बहुत आसानी से मजहब और जनसंख्या को कारण बनाकर गुमराह करते रहते हैं। शिक्षा व्यवस्था को पूरा गुलामों की व्यवस्था बना दिया है जिसमे किसी को भी कोई भी कार्य पूरी तरह करना नही सिखाया जाता बल्कि व्यापार या उद्योग को चलाने के लिए छोटे छोटे नौकर बनना सिखाया जाता है। देश की बैंकिंग व्यवस्था जिसके द्वारा देश के धन को व्यवस्थित किया जाता है को भी मात्र पूंजीपतियों के अंदर की व्यवस्था या मात्र उनके फायदे की व्यवस्था बना दिया गया है। देश के हर नागरिक को अपनी मेहनत से कमाए गए धन को लूटने के लिए बैंकिंग व्यवस्था को अनिवार्य करते गए और पहले ब्याज का लालच दिखलाकर सबका धन इकट्ठा किया गया और मात्र पूंजीपतियों को बड़े उद्योग और व्यापार खड़ा करने के लिए पूंजी प्रदान की जाने लगी और अब तो जनता से उनके मेहनत से कमाए धन से ब्याज तो दूर उसे बैंक में जमा करने के लिए भी पैसे लूटने की आजादी देश की सरकार ने दे दिया है। सम्पूर्ण लूट का खेल पूंजीवादी व्यवस्था के अंतर्गत हो रहा है और सम्पूर्ण भारतीय दिन रात एक कर मेहनत कर रहे हैं कि किसी तरह उनके परिवार की निम्न जरूरतों की पूर्ति हो सके। पर इतने में ही इन पूंजीपतियों के लालच का अंत नही होता, वह तो अब आमजन को अलग अलग तरीके से दिग्भ्रमित कर उनकी कमाई लूटना शुरू कर दिए हैं। आमजन में भी विभिन्न प्रकार का लालच और सुविधा के सपने की आस जगाकर सबके मन मे चोर और अपराधी पैदा करना शुरू कर दिया गया है। जो देश किसी समय मे सम्पूर्ण विश्व को नैतिकता की महान शिक्षा देता था आज उस देश के नागरिकों का अत्यंत नैतिक पतन हो चुका है। लगभग हर कोई ऐसा सोचने लगा है कि कोई न कोई तरीका उन्हें मिल जाये और रातों रात वह राजा बन जाएं। अब मेहनत कर कार्य करने की सोच में कमी आने लगी है। अब किसी को संघर्ष कर प्रगति करने का रास्ता पसंद नही बल्कि कोई जुगाड़ हो जाये तो उनके लिए भी पूंजीवादी व्यवस्था में प्रगति का मार्ग खुल जाए की सोच बनना शुरू हो गया है। देश को राजनीतिक आजादी तो मिल गई पर आज देश का लगभग हर नागरिक पूंजीवादी व्यवस्था का गुलाम बनने को मजबूर हो गया है। सही मायने में देशवासी आजाद तब होंगे जब उन्हें आर्थिक आजादी मिलेगी। उन्हें देश की संपत्ति में अधिकार मिलेगा। उन्हें देश की प्राकृतिक संपत्ति के द्वारा विकास करने एवं शिक्षा द्वारा विकास करने की आजादी मिलेगी। जब हर भारतीय की निम्न जरूरतों की पूर्ति जिसमे भोजन, वस्त्र, मकान, शिक्षा एवं इलाज की व्यवस्था होगी और सभी की आजीविका उनके द्वारा किये जाने वाले विभिन्न कार्यों से पूर्ण होने लगेगा। इसके लिए सबसे पहले समाज मे जरूरत के अनुपात से बहुत ज्यादा संपत्ति संग्रहित करने की व्यवस्था को लगाम देना होगा। शिक्षा व्यवस्था ऐसी बनानी पड़ेगी की हर कोई अपनी मानसिक सोच के अनुसार शिक्षा ग्रहण कर कार्य करने लायक बन सके जिससे उसे अपनी आजीविका अर्जन करने में तकलीफ न हो। प्राकृतिक एवं पैदा की गई संपत्ति को लोगों की क्षमता, जरूरत एवं योगदान के आधार पर बांटने की व्यवस्था हो। क्योंकि सभी की जीवन संबंधित जरूरतें समान है इसलिए जब लोग अपनी एक दूसरे के साथ सहयोग कर उससे पैदा हुवे संपत्ति को सबकी जरूरतों को ध्यान में रखते हुवे भातृभाव से बांटना सिख जाएंगे तो मानव समाज की सही मायने में स्थापना होना शुरू हो जाएगा। जब समाज सभी की भौतिक जरूरतों की पूर्ति करने की व्यवस्था बनाना शुरू कर देगा तो अपने आप ही मानसिक प्रगति भी आरम्भ हो जाएगी और अधिक से अधिक लोगों का सही मायने में मुक्ति एवं मोक्ष की प्राप्ति के लिए आध्यात्मिक रुझान बनना शुरू हो जाएगा। तब कहलायेगा सही मायने में भारतीय स्वतंत्र नही तो यह लालच, ईर्ष्या, नफरत, द्वेष की पूंजीवादी व्यवस्था की स्वतंत्रता नकली और गुमराह करनेवाली है। आशा करता हूँ कि भारतीयों में अपने कल्याण एवं प्रगति की सोच बनना आरम्भ होगा और वह सही मायने में स्वतंत्र होने के इच्छुक बनना आरम्भ करेंगे।
संपादक एवं विश्लेषक:- आदर्श चंद्राकर




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